भारतीय बल्लेबाजों की सफलता का राज 'ट्रिगर प्वाइंट' - क्रिकट्रैकर हिंदी

भारतीय बल्लेबाजों की सफलता का राज ‘ट्रिगर प्वाइंट’

Cheteshwar PujaraIndia
Cheteshwar Pujara of India. (Photo Source: Twitter)

कोहली के करारे शॉट्स, रोहित के लंबे लंबे छक्के और गोली की रफ्तार से सीमा रेखा पार करते धवन के दमदार शॉट्स, इन सबकी रेंज का आपको अंदाजा होगा। इन बल्लेबाजों को अपने शॉट्स बड़े ही परफेक्शन के साथ खेलते भी आपने देखा होगा । ये बल्लेबाज ना तो शरीर से बहुत ही ताकतवर हैं और ना ही कद काठी में लंबे-चौड़े।

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि ये अपनी बल्लेबाजी में इतने माहिर कैसे हैं। कैसे इनकी मौजूदगी भारतीय बैटिंग लाइन अप को वर्ल्ड क्रिकेट में सबसे बेहतर बनाती है। जवाब है ट्रिगर प्वाइंट। ट्रिगर प्वाइंट मतलब स्टांस, जहां से बड़े शॉट्स खेलने की ताकत बनती है।

विराट कोहली के ट्रिगर प्वाइंट यानी स्टांस की बात करें तो इसमें इनका पैर और शरीर संतुलित रहता है। शॉट खेलने से पहले विराट का सिर स्थिर रहता है, दिमाग पर पूरा कमांड होता है, जिस वजह से क्रीज पर गेंद की लेंथ और लाइन को पढ़ने में उन्हें आसानी होती है और करारे शॉट्स जड़ने में सफलता मिलती है।

विराट की तरह ही शिखर धवन भी अपने ट्रिगर प्वाइंट पर बहुत फोकस करते हैं। इनके स्टांस में भी सिर स्थिर रहता है। क्रीज पर उनका मूवमेंट सहज होता है, जिससे उन्हें अपने शॉट्स खुलकर खेलने की आजादी मिलती है।

रोहित के बारे में कहा जाता है कि किसी शॉट को खेलने के लिए उनके पास बाकी बल्लेबाजों के मुकाबले 30 सेकंड ज्यादा होते हैं। रोहित को ये एक्सट्रा 30 सेकंड उनके परफेक्ट ट्रिगर प्वाइंट की बदौलत मिलता है। रोहित के स्टांस की खूबी ये है कि उनका सिर ना सिर्फ स्थिर होता है बल्कि बल्लेबाजी के दौरान बिल्कुल सीधा भी रहता है। गेंद को हिट करते वक्त उसकी लाइन, लेंथ और स्पीड के हिसाब से रोहित अपने पैरों को नियंत्रित करते हैं, जिससे पुल, हुक और बैकफुट पंच जैसे बेहतरीन शॉट्स लगाने में उन्हें सफलता मिलती है।

साफ है कि बल्लेबाजी में ट्रिगर प्वांइट वो जगह है जहां से बल्लेबाज की क्लास का पता चलता है। और, भारतीय बल्लेबाजों का क्लास पिछले कई महीनों से हम लगातार देख रहे हैं। बेजोड़ ट्रिगर प्वाइंट और क्लासिक बल्लेबाजी के दम पर वो ना सिर्फ बड़ी पारियां खेलने में सफल हो रहे हैं, बल्कि ऐसा करते हुए रन, रिकॉर्ड और रैंकिग तीनों में अपनी छाप भी छोड़ रहे हैं।

लेखक- कुमार साकेत